बिलासपुर में ‘नक्शा घोटाला’ का खुलासा, 60 फ्लैट की अनुमति में 90 फ्लैट का नक्शा पास
छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में शहरी विकास से जुड़ा एक बड़ा कथित घोटाला सामने आया है। दस्तावेजों की जांच में ऐसे कई तथ्य सामने आए हैं, जिनसे नगर निगम और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (TCP) विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि निर्माण नियमों और मास्टर प्लान को दरकिनार कर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भवन नक्शों और लेआउट को मंजूरी दी गई।
60 फ्लैट की अनुमति, लेकिन 90 फ्लैट का नक्शा मंजूर
मामला बिलासपुर के अज्ञया नगर क्षेत्र में प्रस्तावित मेसर्स अनंत रियल्टी प्रोजेक्ट से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि इस परियोजना के लिए एरिया स्टेटमेंट में चार मंजिलों पर केवल 60 फ्लैट बनाने का उल्लेख किया गया था।
लेकिन विभागीय स्वीकृति में इसी प्रोजेक्ट के लिए 6 मंजिल और 90 फ्लैट का नक्शा पास कर दिया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि एरिया स्टेटमेंट और स्वीकृत नक्शे में इतना बड़ा अंतर सामान्य प्रशासनिक गलती नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसी विसंगति किसी भी अधिकारी की नजर से आसानी से बच नहीं सकती।
फर्जी आर्किटेक्ट के नाम पर मंजूर हुए सैकड़ों नक्शे
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू उस कथित आर्किटेक्ट का नाम है जिसके जरिए नक्शे पास किए गए। दस्तावेजों में ‘विकास सिंह’ नाम दर्ज है, लेकिन शहर में इस नाम का कोई पंजीकृत आर्किटेक्ट या इंजीनियर मौजूद ही नहीं है।
नगर निगम के रिकॉर्ड और पेशेवर संस्थाओं की जानकारी के अनुसार इस नाम का कोई भी वास्तुकार आधिकारिक रूप से पंजीकृत नहीं है। इसके बावजूद इसी नाम के माध्यम से 400 से अधिक भवन नक्शे और करीब 150 लेआउट स्वीकृत किए जाने का मामला सामने आया है।
महुआ होटल मामले से भी जुड़ा कनेक्शन
जांच में यह भी सामने आया कि पुराने बस स्टैंड के पास स्थित महुआ होटल का नक्शा भी इसी नाम से स्वीकृत किया गया था। नगर निगम ने 13 मई को अवैध निर्माण के आरोप में होटल पर बुलडोजर कार्रवाई की थी।
दस्तावेजों की जांच में पाया गया कि होटल निर्माण में ओपन स्पेस और पार्किंग जैसी अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन किया गया था। इसके बाद 24 जुलाई 2025 को ‘विकास सिंह’ नाम से जुड़े लाइसेंस को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।
EWS आवास के नाम पर झूठा शपथपत्र देने का आरोप
इस प्रकरण में एक और गंभीर आरोप सामने आया है। नियमों के अनुसार बड़े आवासीय प्रोजेक्ट में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आवास आरक्षित करना अनिवार्य होता है।
बताया जा रहा है कि बिल्डर ने विभाग को शपथपत्र देकर दावा किया कि ग्राम तिफरा के खसरा नंबर 407/7 में EWS फ्लैट बनाए जाएंगे। लेकिन राजस्व रिकॉर्ड की जांच में पता चला कि जिस जमीन का उल्लेख किया गया है, वह बिल्डर के नाम पर दर्ज ही नहीं है।
एक ही दिन में 29 लेआउट मंजूर होने पर उठे सवाल
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में एक ही दिन में 29 लेआउट फाइलों को मंजूरी दी गई। शहरी नियोजन विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य प्रक्रिया में इतनी बड़ी संख्या में फाइलों को एक ही दिन में स्वीकृति देना लगभग असंभव है।
इससे विभागीय मिलीभगत की आशंका और मजबूत हो गई है।
करोड़ों रुपये के लेनदेन की आशंका
नगर निगम के आकलन के अनुसार एक एकड़ जमीन के लेआउट को मंजूरी दिलाने में 75 हजार से 2.5 लाख रुपये तक का खर्च आता है। वहीं एक सामान्य भवन नक्शा पास कराने के लिए 8 हजार से 20 हजार रुपये तक शुल्क लिया जाता है।
ऐसे में यदि 400 से अधिक नक्शे और 150 से ज्यादा लेआउट स्वीकृत हुए हैं, तो इस पूरे मामले में करोड़ों रुपये के कथित लेनदेन की आशंका जताई जा रही है।
जांच और कार्रवाई की मांग तेज
इस खुलासे के बाद बिलासपुर के रियल एस्टेट क्षेत्र और प्रशासनिक तंत्र में हलचल मच गई है। नागरिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है।
यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित बिल्डर नमन गोयल और विभागीय अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग तेज हो सकती है। फिलहाल पूरे मामले ने शहर के शहरी विकास तंत्र की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।



