होली की रात सक्ती में बवाल: 5 आदिवासी युवक जेल में, परिजनों का आरोप- पुलिस ने पीटा और फंसाया, पुलिस बोली- गाड़ी तोड़फोड़, हमला और लूट के आरोपी हैं युवक
सक्ती जिले के जैजैपुर थाना क्षेत्र के ग्राम कारीभावर (आमगांव) में 2 मार्च 2026 की होली की रात हुई घटना अब गंभीर विवाद का रूप ले चुकी है। इस मामले में पांच युवकों अजय खैरवार, प्रदीप खैरवार, जितेंद्र खैरवार, मुकेश खैरवार और नंदकुमार खैरवार को पुलिस ने गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया है।
हालांकि, युवकों के परिजनों ने पुलिस की पूरी कार्रवाई को झूठा, मनगढ़ंत और साजिशपूर्ण बताते हुए पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। मामले की शिकायत एसपी, आईजी, डीजीपी और छत्तीसगढ़ अनुसूचित जनजाति आयोग तक पहुंच चुकी है।
परिजनों का आरोप: वसूली, मारपीट और फिर फर्जी केस
परिजनों द्वारा दी गई लिखित शिकायत के अनुसार, घटना 2 मार्च की रात करीब 10–11 बजे की है। गांव कारीभावर, जो थाना जैजैपुर से लगभग 7-8 किलोमीटर दूर है, वहां किसी अज्ञात व्यक्ति ने पुलिस को फोन कर अवैध शराब बनाने की सूचना दी थी।
परिजनों का आरोप है कि इस सूचना पर 7-8 पुलिसकर्मी सिविल ड्रेस में, कथित रूप से शराब के नशे में, पुलिस वाहन के साथ गांव पहुंचे। पुलिस ने वाहन को गांव से लगभग 1 किलोमीटर दूर एक सुनसान मरघटिया स्थान के पास खड़ा कर दिया और खेत के रास्ते पैदल गांव में प्रवेश किया।
शिकायत में बताया गया है कि पुलिसकर्मी कमलेश खैरवार के घर पहुंचे और अवैध शराब के नाम पर कार्रवाई की धमकी देकर उससे 8,500 रुपये लेकर छोड़ दिया। इसके बाद पुलिसकर्मी मोहल्ले में घूमते हुए लोगों को धमकाते रहे और फिर वापस वाहन की ओर लौट गए।
परिजनों के मुताबिक, उसी दौरान गांव के कुछ अन्य शरारती युवक, जो होली के लिए लकड़ी लेने खेत गए थे, उन्होंने खाली खड़ी पुलिस गाड़ी में तोड़फोड़ कर दी और वायरलेस सेट को नुकसान पहुंचाया। उस समय वाहन के पास कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था।
निर्दोष युवकों को उठाया, थाने में बेरहमी से पीटा
शिकायत में आगे बताया गया है कि उसी रात जितेंद्र खैरवार (जो नवागढ़ और पामगढ़ कोर्ट में संविदा कर्मचारी है) और उसका साथी मुकेश खैरवार सोन नदी किनारे गए थे। आरोप है कि पुलिस दल ने उन्हें ही वाहन तोड़फोड़ का आरोपी मान लिया और मौके से पकड़कर मारपीट करते हुए वाहन में डालकर थाना जैजैपुर ले गए।
परिजनों के अनुसार, थाने में दोनों के साथ लाठी-डंडों और घूंसों से जमकर मारपीट की गई, जिससे वे गंभीर रूप से घायल होकर बेहोश हो गए। स्थिति बिगड़ने पर पुलिस ने बचने के लिए झूठी तहरीर तैयार की और दोनों को अस्पताल में भर्ती कराया। यह भी आरोप है कि पुलिस ने डॉक्टरों से मिलकर गलत मेडिकल कार्रवाई कराई।
रात में गांववालों को दी गलत जानकारी
घटना की जानकारी रात करीब 1 बजे गांववालों को मिली। इसके बाद 40-50 महिला-पुरुष थाना पहुंचे और दोनों युवकों के बारे में जानकारी ली।
परिजनों का कहना है कि थाना प्रभारी ने बताया कि दोनों को हल्की चोट आई है और वे अस्पताल में भर्ती हैं। साथ ही गांववालों को मामला शांत रखने और पुलिस के खिलाफ शिकायत नहीं करने की बात कहकर वापस भेज दिया गया।
अगले दिन छोड़ा, 15 दिन बाद फिर किया गिरफ्तार
शिकायत में कहा गया है कि 3 मार्च की शाम दोनों घायलों को अस्पताल से छुट्टी देकर गांव भेज दिया गया, जहां गांव के ही कर्मचारी अरविंद महिपाल ने उनका इलाज किया। परिजनों के अनुसार, दोनों की हालत इतनी गंभीर थी कि वे ठीक से बोल भी नहीं पा रहे थे। इस संबंध में फोटो और मेडिकल रिपोर्ट भी शिकायत के साथ संलग्न किए गए हैं।
इसके बाद 3 मार्च को एसपी और डीएसपी मौके पर पहुंचे, लेकिन गांव में आकर वास्तविक स्थिति की जांच नहीं की। फिर 13 मार्च को एसडीओपी भुनेश्वरी पैकरा गांव पहुंचीं और दोनों युवकों से पूछा कि क्या उन्होंने पुलिस के खिलाफ कोई शिकायत की है।
परिजनों का आरोप है कि 18 मार्च को अचानक पुलिस ने प्रदीप और जितेंद्र को कोर्ट से तथा मुकेश, अजय और नंदकुमार को गांव से उठाकर थाना ले जाकर डकैती समेत गंभीर धाराओं में फंसा दिया।
जातिगत गाली-गलौज और साजिश का आरोप
परिजनों ने आरोप लगाया है कि सभी युवक खैरवार (गोंड) जनजाति के हैं और पुलिस ने उन्हें जातिगत रूप से अपमानित करते हुए गाली-गलौज और मारपीट की। उन्होंने मांग की है कि दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ SC/ST एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर कार्रवाई की जाए तथा निर्दोष युवकों को जेल से रिहा किया जाए।
पुलिस का पक्ष: नशे में उपद्रव, हमला और लूट
वहीं पुलिस के अनुसार, 2 मार्च की रात प्रधान आरक्षक शनि जोशी के नेतृत्व में पेट्रोलिंग टीम ग्राम कारीभावर पहुंची थी। टीम में कुल 7-8 पुलिसकर्मी शामिल थे और वे शासकीय बोलेरो वाहन (CG 03 A 0218) से गश्त कर रहे थे।
पुलिस का दावा है कि रात करीब 11:30 बजे तालाब के पास 7-8 युवक शराब के नशे में गाली-गलौज कर रहे थे। समझाने पर वे उग्र हो गए और पुलिस को धमकाते हुए हमला कर दिया। पुलिस के मुताबिक, युवकों ने लाठी-डंडों और टंगिया से वाहन के शीशे तोड़ दिए, जाली स्टैंड मोड़ दिया और वायरलेस सेट को क्षतिग्रस्त कर दिया।
आरोप है कि उन्होंने आरक्षक श्यामचरण साहू और जयप्रकाश उरांव के साथ मारपीट की, श्यामचरण की वर्दी फाड़ दी और उसकी जेब में रखे 4,000 रुपये लूट लिए। इस घटना में लगभग 90,000 रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया गया है।
केस दर्ज, रकम बरामदगी का दावा
पुलिस ने इस मामले में अप.क्र. 69/2026 के तहत BNS की विभिन्न धाराओं और लोक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम के तहत अपराध दर्ज किया है। विवेचना के दौरान पुलिस ने आरोपियों से कथित रूप से लूट की रकम का कुछ हिस्सा (प्रत्येक से 200–230 रुपये के आसपास) बरामद करने का दावा किया है। साथ ही फटी वर्दी और अन्य साक्ष्य भी जब्त किए गए हैं। पुलिस का कहना है कि प्रथम दृष्टया आरोपियों की संलिप्तता पाई गई है।
कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर साधा निशाना
मामले ने राजनीतिक रूप ले लिया है। सक्ती युवा कांग्रेस के जिला सचिव ने भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि “आदिवासी मुख्यमंत्री के शासन में ही आदिवासी समाज के लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्होंने निर्दोष युवकों को रिहा करने और दोषियों पर कार्यवाही की मांग की है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी परिवार के साथ खड़ा है।”
इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस और परिजनों के दावे पूरी तरह विपरीत हैं। एक पक्ष इसे कानून व्यवस्था पर हमला बता रहा है, तो दूसरा पक्ष पुलिस पर गंभीर आरोप लगा रहा है। ऐसे में अब इस संवेदनशील मामले में निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच ही सच्चाई सामने ला सकती है।



