सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक गायब हो जाएंगे जंक फूड के Ads?
संसद में देश का इकोनॉमिक सर्वे- 2026 पेश हो गया है और देश के आर्थिक विकास की दशा-दिशा बताने के अलावा, इस बार इस दस्तावेज में कुछ और दिलचस्प ऑब्जर्वेशन निकलकर आए हैं. इस बार सरकार ने भारतीयों के लाइफस्टाइल और हेल्थ को लेकर भी बड़ी टिप्पणियां दी हैं, जिसमें मोटापा और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड बड़ी चिंता का विषय बनकर उभरे हैं. Economic Survey में ये चेतावनी आई है कि बदलती खाने की आदतें भारत को मोटापा हॉटस्पॉट बना रही हैं. इस पर सरकार एक इंट्रस्ट्रिंग फैसला भी कर सकती है, जिसमें जंक फूड के विज्ञापन पर सरकार सख्त कदम उठा सकती है.
सरकार ने कहा कि भारत में मोटापा अब सिर्फ लाइफस्टाइल की समस्या नहीं रहा, बल्कि यह तेजी से एक बड़ा पब्लिक हेल्थ चैलेंज बनता जा रहा है. Economic Survey में बताया गया है कि खराब खानपान, बैठकर काम करने की आदत, और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड यानी UPFs का बढ़ता चलन लोगों को बीमार बना रहा है. इसका असर शहरों से लेकर गांवों तक साफ दिखने लगा है.
आज की तेज जिंदगी में लोग कम चलते हैं, ज्यादा समय स्क्रीन के सामने बिताते हैं और पैकेट वाला खाना ज्यादा खाने लगे हैं. नतीजा यह है कि डायबिटीज, हार्ट डिजीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है.
भारत में कितनी विशाल है मोटापे की समस्या?
Economic Survey के मुताबिक, 2019-21 के NFHS डेटा में सामने आया कि भारत में 24 फीसदी महिलाएं और 23 फीसदी पुरुष ओवरवेट या मोटापे का शिकार हैं. 15 से 49 साल की उम्र की महिलाओं में 6.4 फीसदी मोटापे से ग्रस्त हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 4 फीसदी है.
सबसे चिंता की बात बच्चों को लेकर है. पांच साल से कम उम्र के बच्चों में ज्यादा वजन का मामला 2015-16 में 2.1 फीसदी था, जो 2019-21 में बढ़कर 3.4 फीसदी हो गया. अनुमान है कि 2020 में भारत में करीब 3.3 करोड़ बच्चे मोटापे का शिकार थे, और 2035 तक यह संख्या बढ़कर 8.3 करोड़ तक पहुंच सकती है.
जंक फूड का बिजनेस तेजी से बढ़ा
Survey में बताया गया है कि भारत अब दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते Ultra-Processed Food बाजारों में शामिल हो चुका है. 2009 से 2023 के बीच UPF की बिक्री में 150 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. 2006 में जहां इन फूड्स की बिक्री सिर्फ 0.9 अरब डॉलर थी, वहीं 2019 तक यह बढ़कर करीब 38 अरब डॉलर हो गई. यानी करीब 40 गुना उछाल. इसी दौर में भारत में पुरुषों और महिलाओं दोनों में मोटापा लगभग दोगुना हो गया. यानी जितना ज्यादा पैकेट वाला खाना, उतना ज्यादा मोटापा.
इकॉनमी पर कैसे बोझ बना जंक फूड
Economic Survey कहता है कि UPF का बढ़ता इस्तेमाल सिर्फ सेहत नहीं बिगाड़ रहा, बल्कि देश की इकॉनमी पर भी बोझ डाल रहा है. इलाज पर खर्च बढ़ रहा है, काम करने की क्षमता घट रही है और लंबे समय में सरकार पर हेल्थकेयर का दबाव बढ़ सकता है.
सरकार क्या कर सकती है?
Survey में सुझाव दिया गया है कि Ultra-Processed Food के विज्ञापनों पर सख्ती होनी चाहिए. खासतौर पर सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक टीवी, डिजिटल और सोशल मीडिया पर इनके विज्ञापनों पर रोक लगाने पर विचार किया जा सकता है. चिली जैसे देशों ने पहले ही ऐसे कानून बनाए हैं. नॉर्वे और UK में भी बच्चों को जंक फूड विज्ञापनों से बचाने के लिए नियम लागू हैं. हाल ही में UK ने रात 9 बजे से पहले टीवी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जंक फूड के विज्ञापनों पर बैन लगाया है. भारत में भी स्कूल और कॉलेज इवेंट्स में UPF कंपनियों की स्पॉन्सरशिप पर रोक जैसे कदम उठाने की बात कही गई है. इसमें सेलेब्रिटीज़ की ओर से जंक फूड का विज्ञापन और ‘I bet you can’t eat just one’ और ‘buy one get one free’ जैसे टैक्टिक्स को भी दोषी माना गया है.
यानी कि सरकार ने इस बार Economic Survey में ये भी मैसेज देने की कोशिश की है कि अगर भारत को हेल्दी बनाना है तो लोगों की प्लेट बदलनी होगी. घर का खाना, कम प्रोसेस्ड फूड, ज्यादा चलना और बच्चों को जंक फूड से दूर रखना जरूरी होगा.



