बंगाल SIR में पर्दे के पीछे चल रहा था खेल, साफ्टवेयर देख चौंका चुनाव आयोग, पकड़ी अफसरों की गर्दन
कोलकाताः पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग (ECI) का चाबुक चला है. चार अधिकारियों और एक कर्मचारी पर एफआईआर के आदेश दिए गए हैं. आरोप है कि ये अफसर वोटर लिस्ट में फर्जीवाड़ा कर रहे थे. जांच में सामने आया है कि मोयना और बारुईपुर पूर्व में तैनात इन अफसरों ने फिजिकल वेरिफिकेशन के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति की और फर्जी वोटरों को वैध होने का सर्टिफिकेट दे दिया. चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने इन क्षेत्रों में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के तहत हजारों नाम अलग छांट कर रखे थे.
सॉफ्टवेयर ने अलर्ट दिया कि एक ही मकान नंबर पर 10, 15 या 20 लोग रजिस्टर्ड हैं, जो व्यावहारिक रूप से असंभव है. या फिर एक ही फोटो/आईडी पर कई नाम हैं. नियम के मुताबिक, ईआरओ और एईआरओ को अपनी टीम भेजकर उस घर की जांच करानी थी कि क्या वाकई वहां इतने लोग रहते हैं. लेकिन इन अफसरों ने बिना जमीनी जांच किए, सिस्टम में वेरिफाइड का बटन दबा दिया. यानी उन्होंने झूठ पर अपनी आधिकारिक मुहर लगा दी.
हवा में तैरते मतदाता
वोटर लिस्ट में एक श्रेणी होती है ‘अनमैप्ड वोटर्स’. ये वे लोग होते हैं जिनका नाम लिस्ट में तो है, लेकिन उन्हें किसी पोलिंग बूथ या घर के पते से नहीं जोड़ा गया है.अफसरों को इन्हें ट्रैक करना था. अगर वे वहां रहते हैं, तो उन्हें सही बूथ देना था. अगर नहीं रहते, तो नाम काटना था. लेकिन इन अफसरों ने इन नामों को लिस्ट में वैसे ही पड़े रहने दिया. जांच में पाया गया कि इनमें से कई फर्जी मतदाता थे जिनका इस्तेमाल चुनावों में बोगस वोटिंग के लिए किया जा सकता था. अफसरों ने इन्हें डिलीट करने की जहमत नहीं उठाई.
मृत लोगों को जीवनदान
मोयना विधानसभा क्षेत्र में जांच के दौरान यह बात सामने आई कि कई ऐसे लोगों के नाम वोटर लिस्ट में चमक रहे थे, जिनकी मौत काफी पहले हो चुकी है. मृत्यु प्रमाण पत्र और फॉर्म-7 (नाम हटाने का आवेदन) पेंडिंग पड़े रहे, या जानबूझकर इग्नोर किए गए. अफसरों ने डिलीशन की प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाल दिया, जिससे वोटर लिस्ट की संख्या बढ़ी हुई दिख रही थी.
24 लाख संदिग्धों की जड़ में यही लापरवाही
आयोग ने पाया कि पूरे राज्य में जो 24 लाख संदिग्ध मतदाता सामने आए हैं, उनके पीछे यही पैटर्न है.इनमें एक ही तरह के 6 से ज्यादा नाम एक साथ हैं. जब ऊपर से दबाव आया कि लिस्ट साफ करो, तो इन अफसरों ने बीएलओ के जरिए डाटा सही करवाने के बजाय शॉर्टकट अपनाया. जहाँ वास्तव में नाम कटने चाहिए थे, वहां भी लीपापोती की गई. चुनाव आयोग ने माना कि यह ‘मानवीय भूल’ नहीं है. जब एक अधिकारी को साफ दिख रहा है कि एक 100 वर्ग फुट के घर में 25 वोटर दिखाए गए हैं और वह उसे बिना जांचे पास कर देता है, तो यह लापरवाही और आपराधिक साजिश की श्रेणी में आता है. यह लोकतंत्र की नींव यानी निष्पक्ष चुनाव के साथ खिलवाड़ है.
किसी दल के दबाव में तो ये नहीं किया?
जिन चार अफसरों (ERO/AERO) पर केस दर्ज हुआ है, पुलिस अब उनसे पूछेगी आपने वेरीफाई बटन क्यों दबाया? क्या किसी राजनीतिक दल का दबाव था? किसने कहा था कि इन फर्जी नामों को लिस्ट में रहने दो? 14 फरवरी को फाइनल लिस्ट आने से पहले यह कार्रवाई बाकी जिलों के डीएम और अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है- अगर वोटर लिस्ट में फर्जीवाड़ा मिला, तो सिर्फ ट्रांसफर नहीं होगा, सीधे जेल जाने की नौबत आएगी.
जिन चार अफसरों (ERO/AERO) पर केस दर्ज हुआ है, पुलिस अब उनसे पूछेगी आपने वेरीफाई बटन क्यों दबाया? क्या किसी राजनीतिक दल का दबाव था? किसने कहा था कि इन फर्जी नामों को लिस्ट में रहने दो? 14 फरवरी को फाइनल लिस्ट आने से पहले यह कार्रवाई बाकी जिलों के डीएम और अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है- अगर वोटर लिस्ट में फर्जीवाड़ा मिला, तो सिर्फ ट्रांसफर नहीं होगा, सीधे जेल जाने की नौबत आएगी.



