गंगा भी बन जाएगी सरस्वती, पानी के लिए तरसेंगे करोड़ों लोग, प्रयागराज संगम से दो नदियों के गायब होने का खतरा
क्लाइमेट चेंज का असर पूरी दुनिया पर दिखने लगा है. आमलोगों पर इसका प्रभाव भी पड़ रहा है. अब हिमालय में गंगा के उद्गम स्थल गंगोत्री ग्लेशियर सिस्टम को लेकर किए गए एक नए स्टडी में डराने वाली बात सामने आई है. लब्बोलुआब यह है कि यदि इसपर कंट्रोल नहीं किया गया तो एक वक्त ऐसा आएगा जब गंगा जैसी अन्य नदियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा और यह भी सरस्वती की तरह विलुप्त होने की कगार पर आ जएगी. यदि ऐसा होता है तो इससे लाखों-करोड़ों लोग प्रभावित होंगे. वे न केवल पानी के लिए तरसेंगे, बल्कि खेतीबारी भी संकट में पड़ जाएगा. वहीं, प्रयागराज के पवित्र संगम में सिर्फ एक नदी बचेगी. बता दें कि संगम में गंगा और यमुना के साथ ही सरस्वती (प्रतीकात्मक) नदियां मिलती हैं.
क्यों महत्त्वपूर्ण है GGS
- अध्ययन में पाया गया कि गंगोत्री ग्लेशियर सिस्टम से सबसे ज्यादा जल प्रवाह जुलाई में होता है, जो औसतन 129 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंचता है.
- 1980–2020 के बीच वार्षिक औसत प्रवाह 28±1.9 घन मीटर प्रति सेकंड आंका गया. इसमें सबसे ज्यादा योगदान हिमपिघल (64%) का था, इसके बाद ग्लेशियर मेल्ट (21%), वर्षा-रनऑफ (11%) और बेस फ्लो (4%) का.
- 1990 के बाद जल प्रवाह का पीक अगस्त से खिसककर जुलाई में आ गया, जिसका कारण सर्दियों की वर्षा में कमी और शुरुआती गर्मियों में पिघलने की रफ्तार बढ़ना बताया गया.
- अध्ययन के अनुसार वार्षिक तापमान में बढ़ोतरी हुई है, हालांकि वर्षा और ग्लेशियर मेल्ट में कोई विशेष रुझान नहीं दिखा.
अध्ययन के मुताबिक गंगोत्री क्षेत्र में वर्षा से होने वाले रनऑफ और बेस फ्लो में वृद्धि दर्ज की गई है, जो गर्मी से प्रेरित जलविज्ञान परिवर्तनों की ओर इशारा करता है. हाल के वर्षों में उत्तर भारत में मानसून अधिक तेज रहा है. इस वर्ष जून से अगस्त के बीच सामान्य से करीब 25% अधिक बारिश दर्ज की गई. उत्तराखंड, जम्मू और हिमाचल प्रदेश में कई बार अचानक आई बाढ़ को क्लाउडबर्स्ट कहकर बताया गया, लेकिन वैज्ञानिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं हुई.
मौसम के तेवर हो सकते हैं तल्ख



