अयोध्या में 37, मुर्शिदाबाद में 72… बाबरी के बहाने हुमायूं कबीर जो समझा रहे, वो कितना खतरनाक?
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है. तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर ने ‘बाबरी मस्जिद’ के नाम पर एक ऐसा दांव खेला है, जो सिर्फ एक मस्जिद निर्माण की बात नहीं है, बल्कि संख्याबल यानी डेमोग्राफी की ताकत दिखाने का खुला संदेश है. आईएएनएस को दिए एक इंटरव्यू में कबीर ने जो तर्क दिए, वे बेहद चिंताजनक और भड़काऊ माने जा रहे हैं. उन्होंने साफ शब्दों में अयोध्या और मुर्शिदाबाद की तुलना ‘मुस्लिम आबादी’ के प्रतिशत के आधार पर की. उनका कहना है कि अयोध्या में मुस्लिम कम थे, इसलिए वहां बाबरी मस्जिद नहीं बन पाई, लेकिन मुर्शिदाबाद में मुस्लिम 72 फीसदी हैं, इसलिए यहां बाबरी मस्जिद जरूर बनेगी और कोई इसे रोक नहीं पाएगा. यह एक खतरनाक नैरेटिव सेट करने की कोशिश है… ‘जहां हमारी संख्या ज्यादा, वहां हमारी मर्जी चलेगी.’
हुमायूं कबीर का यह बयान 1992 की बाबरी विध्वंस और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले को एक अलग ही चश्मे से देखता है. कबीर कहते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने 5 एकड़ जमीन दी थी, लेकिन वहां मुस्लिम आबादी कम है, इसलिए मस्जिद नहीं बन पाई. बंगाल में मुस्लिम आबादी 37 फीसदी है और मुर्शिदाबाद जिले में यह 72 फीसदी है. तो अगर यहां बाबरी मस्जिद बन रही है, तो मुझे समझ नहीं आता कि समस्या क्या है?
विश्लेषकों का मानना है कि कबीर का यह तर्क बेहद खतरनाक है. वे कानून या संविधान की बात नहीं कर रहे, बल्कि वे यह संदेश दे रहे हैं कि किसी भी धार्मिक ढांचे या विचारधारा का अस्तित्व वहां की स्थानीय आबादी के धर्म पर निर्भर करता है. यह तर्क भारत की धर्मनिरपेक्षता की मूल भावना के खिलाफ है, जो कहता है कि कानून हर जगह बराबर है, चाहे वहां किसी भी धर्म के लोग रहते हों.
जब उनसे पूछा गया कि लोग इसका विरोध क्यों कर रहे हैं, तो कबीर ने एक घरेलू उदाहरण देकर अपने इरादे साफ कर दिए. उन्होंने कहा, मेरे घर में अगर कोई बच्चा पैदा होता है, तो उसका नाम क्या होगा, यह मैं तय करूंगा. उसी तरह, मैं एक मस्जिद बना रहा हूं और मैंने उसका नाम बाबरी मस्जिद तय किया है. दूसरों को इससे क्यों दिक्कत हो रही है? उन्होंने कहा, मेरा हक है मस्जिद बनाने का और उसे नाम देने का. सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि भारत में कहीं और बाबरी मस्जिद नहीं बन सकती. यह बयान केवल एक इमारत बनाने तक सीमित नहीं है. ‘बाबरी’ नाम का चुनाव जानबूझकर किया गया है ताकि एक विशेष समुदाय की भावनाओं को उकसाया जा सके और राजनीतिक लाभ उठाया जा सके.
“कोई उकसाएगा तो जवाब देंगे”
हुमायूं कबीर ने धमकी भरे लहजे में यह भी कहा कि अगर कोई उनके “विजन” में बाधा डालने की कोशिश करेगा, तो वे चुप नहीं बैठेंगे. उन्होंने कहा, कुछ लोग मुसीबत खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं… अगर कोई उकसाने की कोशिश करेगा, तो मैं भी उसी हिसाब से जवाब दूंगा. इसलिए किसी को भी मुसीबत खड़ी करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. और किसी को भी किसी तरह से डरना नहीं चाहिए. और मैं डरने वाला नहीं हूं.
मुस्लिम वोट बैंक की नई गोलबंदी
हुमायूं कबीर सिर्फ धार्मिक भावनाओं को हवा नहीं दे रहे, बल्कि इसके पीछे एक ठोस राजनीतिक रणनीति भी है. उनकी नजर आगामी बंगाल विधानसभा चुनावों पर है. उन्होंने साफ कर दिया है कि वे असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM) और नौशाद सिद्दीकी (ISF) के साथ गठबंधन करना चाहते हैं.
कबीर का गणित साफ है…
मुर्शिदाबाद: 22 में से 17 सीटें जीतने का दावा.
मालदा और दिनाजपुर: यहां भी मुस्लिम बहुल सीटों पर नजर.
ओवैसी और सिद्दीकी को साथ लेकर ‘मुस्लिम अधिकारों’ के नाम पर वोट मांगना.
कबीर ने ममता बनर्जी और वाम दलों दोनों पर हमला बोला. उन्होंने कहा, वाम मोर्चा ने 34 साल और ममता बनर्जी ने 14 साल तक मुसलमानों को धोखा दिया. अब मुसलमानों के जवाब देने का वक्त आ गया है. मुसलमानों को किसी का गुलाम नहीं होना चाहिए, सिर्फ अल्लाह का गुलाम होना चाहिए.
खतरा क्या है?
हुमायूं कबीर का यह पूरा अभियान अयोध्या vs मुर्शिदाबाद का नैरेटिव, 72% आबादी का दम भरना, और ‘गुलामी’ से आजादी की बात करना, बंगाल की राजनीति को एक खतरनाक मोड़ पर ले जा रहा है. यह बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच खाई को और चौड़ा करेगा. आबादी के प्रतिशत को ताकत के रूप में पेश करना, लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा है. “मैं जवाब दूंगा” जैसी भाषा प्रशासन और कानून के शासन को सीधी चुनौती है.
बाबरी मस्जिद के बहाने हुमायूं कबीर जो समझा रहे हैं, वह सिर्फ एक इमारत की बात नहीं है. यह एक विचारधारा का प्रदर्शन है जो मानता है कि ‘संख्याबल ही शक्ति है’ और जहां संख्या है, वहां संविधान से ऊपर अपनी मर्जी चलाई जा सकती है. बंगाल के लिए आने वाले दिन सियासी तौर पर बेहद उथल-पुथल भरे हो सकते हैं.



